मनोहर कहानियाँ

Horror stories collection. All kind of thriller stories in English and hindi.
Jemsbond
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Re: मनोहर कहानियाँ

Unread post by Jemsbond » 20 Dec 2014 04:23

मुफलसी ने बनाया कालगर्ल


मेरा नाम नाजनीन है, घर में प्यार से मुझे सब नाजो कहकर बुलाते थे। मेरे वालिद रिक्शा चलाकर परिवार का पेट पालते थे। मां अनपढ़, घरेलू और धार्मिक महिला थी। मुझसे पांच और तीन वर्ष बड़ी दो बहनें तथा मेरे बाद आठ और सात वर्ष छोटे दो भाई हैं। मैंने बचपना घोर निर्धनता में काटा। मैंने और मुझसें पांच वर्ष बड़ी बहन महजबी जिसे मैं बाजी कहती थी, ने पाचवीं तक पढाई की। घर के करीब ही नगर-महापालिका का सरकारी स्कूल था, अतः मामूली खर्च और फीस में हमने इतना पढ लिया था। प्राईमरी से आगे की पढाई का बोझ उठाने में घर वाले किसी भी तरह समर्थ न थे, अतः पढाई रूक गयी थी।
बाजी मेहनती स्वभाव की थी, पाचवीं पास करने के कुछ दिनों बाद बुक बाइडिंग के लिए फर्मे मोड़ने का कार्य घर लाकर करने लगी। मां भी हाथ बटाने लगी, घर में चार पैसे आने लगे। वक्त गुजरता रहा समय के साथ महजबी बाजी के पन्द्र्रह-सोलह साल की होते-होते मां-बाप ने अपने ही स्तर के एक मेहनतकश मजदूर पेशा, बिरादरी के युवक से बाजी का निकाह कर दिया।
निकाह के बाद कुछ समय तक बाजी की दुल्हा-भाई के साथ अच्छी कटी। तीन साल गुजर जाने के बाद भी बाल-बच्चा न हुआ तो सारा दोष मेरी बहन को दिया जाने लगा। इसी बीच दुल्हा भाई ज्यादा कमाई करने के चक्कर में दिल्ली जाकर रहने लगे। दिल्ली में वह झुग्गी-झोपडि़यों में रहकर गुजारा करते हुए कुछ आमदनी बढाने का जरिया खोजते-खोजते उनका झुग्गी-झोपड़ी की ही एक औरत से आंख लड़ गयी।
औरत से आंख लड़ने के बाद वह जहां हफ्ते-हफ्ते आकर बाजी को खर्च दे जाते थे। अब वह महीना-महीना तक पलटकर देखना भी बंद कर दिया। बाजी तंगी में रहने लगी तो वालिद को चिंता हुई। दुल्हा भाई के पते पर बाजी के साथ मुझे भी लेकर गए। हम दोनों को वहां पहुचा कर वालिद लौट आए। दुल्हा भाई की नजर तो फिर ही चुकी थी। बाजी से बचने के लिए हफ्तों-हफ्तों के लिए गायब हो जाते। धीरे-धीरे उनकी तबियत में बिल्कुल लापरवाही और निठल्लापन आता गया। लिहाजा खोली का भाड़ा, परचूनिये का हिसाब चढता रहा, लेनदार तकाजे कि लिए बाजी के पास आने लगे। उन्हीं में एक थे रमजानी मियां।
रमजानी मियां की उम्र चालिस के आस-पास थी। दुल्हा भाई के घर के पास ही उनकी लकडि़यों की टाल थी। अच्छी आमदनी थी। उनका खाना-पीना अच्छा था। सेहत अच्छी थी। धीरे-धीरे हमदर्दी बढाते-बढाते वह घर में फल-फ्रूट लाते और घंटा-घंटा बैठकर बाजी से मुस्कराकर बात करने के साथ बेतकल्लुफी भी बढानी शुरू कर दी थी।
रमजानी मियां की हमदर्दी ने बाजी पर ऐसा असर चढा़या कि वे समय-असमय उनकी लकड़ी की टाल पर किसी ने किसी जरूरत से जाने लगी। एक रात वह भी आयी जब मैं झुग्गी के पार्टीशन वाले कमरे में सो रही थी। वह जाड़े की रात थी, कोई दस बजे का समय रहा होगा। एक नीद मैं ले चुकी थी। दरवाजे पर हल्की सी आहट हुई तो मैं समझी दुल्हा भाई चोरी से आये होंगे। सांकल खुली दबे पांव अन्दर आने वाले रमजानी मियां थे।
झुग्गी की पार्टीशन वाले कमरे को बांस का टहर और टाट के परदे लगाकर पार्टीशन का रूप दिया गया था। एक चारपाई भर की छोटी सी जगह थी। वहां बर्तन-भाड़े, कपड़े-लत्ते रखे जाते थे। इसी कमरे को गुसलखाने के रूप में भी इस्तेमाल में लाया जाता था। मुझे पिछले दो दिनों सो बाजी ने वहीं साने की सलाह दे रखी थी। वैसे भी जब दुल्हा भाई रात को देर-सवेर घर आते थे, मुझे वहीं पार्टीशन वाले कमरे में सो के लिए भेज दिया जाता था। बाजी व दूल्हा भाई झुग्गी में टिमटिमाता हुआ मरियल रोशनी फैलाने वाला बल्ब बुझाकर एक साथ सो जाते थे। रमजानी मियां रात दस बजे के बाद, चोरी से झुग्गी में आये तो मेरी उत्कठां बढ़ी। मेरे कान सजग हो गये। अनेकों प्रश्न मस्तिष्क में मंडराने लगे। आते ही उन्होनें बाजी से पूछा, ‘‘नाजो तो सो गयी होगी?’’
‘‘जवानी की नींद है, घोडे़ बेचकर सो रही होगी..... ’’ बाजी ने फुसफुसाकर बताया था। इस बात को सुनते ही रमजानी मियां बेधड़क बढ़कर बाजी को अपने बाहुपाश में ले लिया। फिर बाजी के कपोलों को चूमते हुए रमजानी मियां के हाथ बाजी के बेहद कामातुर, उन्नत वक्षों पर दौड़ने लगे।
यूं तो बाजी के तन्दरूस्त जिस्म का हर अंग भरा-भरा, गठीला और सुडौल था। पर उनके वक्ष कुछ ज्यादा ही ठोस और उभारदार थे। जिनके आकार को दुपट्टे के आवरण से भी छुपाया नही जा सकता था। मुझे लेकर जब वह बाजार जाती तो मर्दो की नजरें उनके वक्षों के उभार का जायजा लेती हुई वस्त्रों के पार तक टटोलने की चेष्टा करती रहती थी।
रमजानी मियां अपने हाथों को हरकतें देकर खुद को गरमाते हुए बाजी की भी ठंडक भगाने लगे। एक समय वह आया जब उन्होंने बाजी को पूरी तरह कपड़ों के कैद से आजाद कर दिया। अब बाजी की चिकनी मासल पीठ, सुडौल तना वक्ष रमजानी मियां के हाथों और मंुह की रहकतों से ठोस हो चुके यौवन की खूबसूरती मेरी आंखों में नाचने लगी।
मेरी खाट टटरे से लगी हुई बिछी थी। टाट के परदे के झरोखे से मैं सारा दृश्य देख रही थी। बाजी रमजानी मियां से बार-बार रोशनी बुझाने का आग्रह कर रही थी। जबकि रमजानी मियां कह रहे थे, ‘‘आज मैं तुम्हारे हुस्न और यौवन भरपूर नजरों से देखकर अपनी प्यास बुझाना चाहता हूं मेरी जान..... इतने दिनों से तो ऊपर-ऊपर से पत्ते फेटकर खुद को तसल्ली देता रहा हूं.... आज असली पत्ते फेटने का मामला ऐसे ही चलेगा... मैं तुम्हारे गुदाज, ठोस जिस्म के रेशे-रेशे को देखकर अपनी प्यास बुझाना चाहता हंू... ’’
‘‘हाय अल्लाह!’’ बाजी शरमा गयी थी।
प्रतीक चित्र
खैर मैं इस बात को तो समझ गयी थी कि दोनों के बीच खिचड़ी कई दिनों से पक रही है। मैने रमजानी मियां को जिस्मानी तौर पर जितना हृष्ट-पुष्ट देखा था। उतना ही वह अपने असली जोश में सुस्त रफ्तार के घोड़े साबित हुए थे। ऐसा घोड़ा जो चाबुक की मार या लगाम की खींच-तान पर ही दौड़ के लिए तैयार होता है। बाजी उनकी मेहरबानियों के बदले हर वह स्थान और युक्ति इस्तेमाल कर रही थी, जिसे रमजानी मियां चाह रहे थे। उनको खुश करते हुए बाजी अपने मतलब की बात पर आते हुए बोली, ‘‘आप हमारा कर्ज नही अदा कर सकते?’’
‘‘मैं सौ रूपए हफ्ता से तुम्हारी मदद कर सकता हंू। अपना किराया समझो मैने तुम पर छोड़ा, मगर तुम्हें मुझे बराबर खुश करते रहना होगा। एक मुश्त परचूनियां तथा दूसरों का डेढ़-दो हजार का कर्ज अदा करना फिलहाल मेरे लिए मुश्किल है।’’
‘‘सौ रूपए हफ्ता ही सही। मैं धीरे-धीरे लोगों का कर्ज उतारती रहूंगी।’’
‘‘अगर तुम मेरी मानो, अगर तुम दस दिनों तक पूरी रात मेरी टाल की कोठरी में आकर साने को तैयार हो जाओ तो मैं तुम्हारा सारा कर्जा उतारवाकर डेढ़-दो हजार रूपए अलग से कमवा सकता हूं।’’
‘‘हाय अल्लाह.... नही-नही आपसे तो बस दिल लग गया इसलिए..... वरना मैं ऐसी नही हूं। मेरी तो दुर्गति बन जाएगी।’’
‘‘एक मशवरा और है..... ’’ अपनी केलि-क्रीड़ा के मध्य कहा था रमजानी मियां ने, ‘‘गरीबी जादू की छड़ी के घुमाने की तरह दूर हो जायेगी.... हजारों-लाखों में खेलने लगोगी।’’
‘‘वह क्या?’’
‘‘अपनी बहन नाजों को घंघे में उतार दो। मेरे यहां जो ठेकेदार आता है.... ’’
‘‘शेखर बाबू.... ’’
‘‘हां.... उसने नाजों को देखा हैं। मुझसे कह रहा था उस छोकरी को पटा दो, एक रात का पांच हजार दे सकता हूं।’’
अपने विषय में रमजानी का प्रस्ताव सुन मेरा दिल धाड़-धाड़ करने लगा। जी चाहा रहा था कि रमजानी का मुह नोच लूं पर, उनकी उस समय की आनन्दमय क्रिया देखने के पीछे सब अहसास दब गए थे। बाजी का उत्तर सुनने के लिए मैंने सांसे रोक ली। वह कह रही थी।
‘‘अल्ला कसम रमजानी मियां, हमारे यहां यह सब नही चलता.... ’’
‘‘तुम मूर्ख हो.... ’’ रमजानी ने बाजी के गालों को थपकाकर चुटकियों से मसलते हुए कहा, ‘‘तभी घर में ठीक से चूल्हा नही जलता.... मैं तुम्हें झुग्गी-झोपड़ी का नही अपने खुद के मकान-मालिक होने का रास्ता बता रहा हूं। मेरे सम्पर्क में दर्जनों ऐसी हसीन, ऊंचे घराने की कहलाने वाली लडकियां है जो शराफत को चोला धारण किये रहती है, पर रात को दो-चार घंटे के लिए धंधे पर उतरती है और हजारों रूपए माहवार कमाकर ठाठ-बाट की जिन्दगी गुजारती है। मुझे भी कमीशन के तौर पर आमदनी कराती है।’’
रमजानी मियां ने ऐसा पटाया कि बाजी एकदम विरोध करने के बजाय सोच-विचार में पड़ गयी। बाजी को सोचते देख रमजानी मियां बोले, ‘‘बताया नही..... ’’
‘‘सोचकर बताऊंगी.... ’’ बाजी ने कहा, ‘‘पता नही नाजो राजी होगीे या नही.... ’’
‘‘मेरे पास घंटे-आधे घंटे के लिए भेजना आरम्भ कर दो। मैं उसे राजी कर लूंगा।’’
‘‘उसे भी खराब कर दोगे।’’
‘‘कसम से.. अपने लिए इस्तेमाल नही करूगा.. एकदम तैयार करके पांच हजार रूपए कमवाउगा।’’
खैर, अब मैं बाजी का मामला कुछ शब्दों के बाद ड्राप करती हूं। रमजानी मियां ने बाजी के हाथ मे दो सौ रूपये, तथा अलग से दो सौ मेरे नाम पर थमाते हुए कहा था, ‘‘नाजो को अच्छा सा कपड़ा बनवा देना। वह खुश हो जाएगी।’’
बाजी चार सौ रूपए खुशी-खुशी स्वीकार कर उन्हें रूखसत किया था। अगले दिन बाजी का व्यवहार मेरे प्रति बहुत बदल गया था। वह मेरा अधिक ख्याल रखते हुए रमजानी मियां के प्रसंशा के पुल बांध रही थी। एक दिन दोपहर के समय उन्होंने मुझे सूखी लकडि़या ले आने के बहाने रमजानी की टाल पर भेजा। उस दिन मौसम का मिजाज बिगड़ा हुआ था। सुबह से ही रह-रहकर बूंदा-बादी हो रही थी। मैं जल्दी-जल्दी टाल पर लकडि़या लेने गयी। टाल पर मौसम की खराबी की वजह से कोई ग्राहक नही था। इसलिए पूरी तरह सन्नाटा फैला हुआ था। टाल पर मुझे आया देख रमजानी मियां खिल उठे और मुस्कराकर स्वागत भाव दर्शाते हुए बोले, ‘‘ आजा..... आजा नाजो.... आज तो बड़ी अच्छी लग रही हो।’’
‘‘सूखी लकडि़यों के लिए बाजी ने भेजा है रमजानी मियां चाचा... ’’ मैं उन्हें रमजानी चाचा ही कहती थी।
‘‘हां..हां..क्यों नही.....उधर कोने में, शेड के नीचे की लकडियां पूरी तरह सूखी और पतली है...जितना चाहो निकाल लो।’’
मुझे उन्होंने टाल के ऊंचे चट्टे के पीछे भेजा। खुद गेट के पास जाकर गेट बन्द कर आये। मेरा दिल धक-धक कर रहा था। हकीकत यह थी कि मैं उस आनन्द की अनुभूति स्वयं करना चाहती थी, जिससे बाजी को गुजरते देख चुकी थी। टाल के ऊंचे चट्टों के पीछे, कुछ अंधेरा भी था, पर ऐसा नही कि कुछ दिखायी न देता हो। रमजानी मियां उस समय तहमत, बनियान में थे। ठीक मेरे पीछे आ गये। मुझे इशारा करके वह सूखी पतली लकडि़यां बताने लगे। मेरे हाथ लकडि़यां निकालने के लिए बढ़े तब पीछे से आकर वह मुझसे एकदम सटकर खड़े होते हुए लकडि़यां निकालने में मेरी मदद करते-करते उन्होंने मेरा हाथ थामते हुए कहा, ‘‘तू तो बड़ी ही खूबसूरत है नाजो.... ’’
मेरे दिल की धड़कने बढती जा रही थी। कुछ घबराहट हो रही थी। मैने हाथ छुड़ाना चाहा तो वे और निकट आकर मुझे पीछे से चिपटाकर बोले, ‘‘मैं तेरी जिन्दगी संवार दूगा, मैं चाहता हूं तू अपनी बाजी की तरह तंगी और अभावों में न जिये, ऐश कर ऐश.... ’’ कहकर वे मेरे उभारों को सहलाने लगे।
प्रतीक चित्र
मैं बार-बार नही-नही कहती रही, मगर उस नही में हर पल मेरी हां शामिल थी। यह बात वे भी जानते थे। तभी तो मेरे बराबर इंकार करने के बाबजूद वह मुझे उठाकर कोने में पडे़ गद्दा व तकिया लगे तख्त पर ले गये। मुझे लिटाकर चूमना आरम्भ किया तो मेरे तन-बदन में जैसे आग लग गयी थी फिर भी मैने इससे आगे उन्हें नही बढने दिया और अलग होकर उठ खड़ी हुई। उन्होंने कोई विरोध नही किया, पचास का नोट मेरे हाथ में पकड़ाते हुए बोले, ‘‘बाजी को मत बताना.... अपने ही ऊपर खर्च करना, फिर जब भी आओगी इतना ही मिलेगा।’’
मैं हवा में उड़ती घर पहुंची। बाजी ने कुछ पूछताछ नही की और मैंने भी अपनी तरफ से उन्हें कुछ बतना जरूरी नही समझा। अगली शाम फिर बाजी ने मुझे लकडि़यां लाने रमजानी के यहां भेजा और बोली, ‘‘अगर तुझे आने में देर हो जाय तो फिक्र मत करना, रमजानी मियां जो कहें कर देना, उनके बहुत एहसान है हम पर.... ’’
मैने सर हिलाकर हामी भर दी। मैं रमजानी के टाल पर पहंुची। मुझे दिखते ही वह खिल उठे और गेट बंद कर दिया। उस रोज टाल में एक मोटरसाइकिल भी खड़ी थी, जाने कौन आया था।
‘‘नाजो क्या तू नही चाहती तेरे पास खूब दौलत हो, जेवर हो, मकान हो.... ’’
‘‘चाहती क्यों नही, मगर चाहने से क्या होता है।’’
‘‘चाहने से ही होता है। अगर तू मेरा कहना मान तो दो हजार तो मैं तुझे आज ही दिलवा सकता हूं और आगे भी ऐसे ही मौके दिलवाता रहूंगा।’’
‘‘दो हजार.... ’’ मेरी धड़कने बढ़ गई। मैं चुप रही, मैं खुद भी किसी मर्द का साथ पाने को तड़प रही थी मगर वह मामला अटपटा लग रहा था। रमजानी मियां मुझे किसी अंजान व्यक्ति के साथ सुलाना चाहता था। जो ना मालूम किस तरह पेश आता। मै डर रही थी मगर दो हजार रूपयों के लोभ से मुंह मोड़ना मेरे लिए असम्भव था। फिर भी मैने रमजानी से आश्वासन ले लिया कि वह बगल के कमरे में मौजूद रहेगा। यही मेरे कालगर्ल जीवन की पहली शुरूआत थी।
उस दिन जिस युवक के बिस्तर पर मैने अपना कौमार्य लुटाया, वह मेरा परमानेंट ग्राहक बन गया। अगले दस दिनों तक लगातार वह रमजानी के टाल पर आता रहा। दस दिनों में बीस हजार रूपये की कमाई ने मेरा दिमाग खराब कर दिया। मैं धंधे में रमती चली गई। मैने वह सब कुछ पाया जिसकी मैने जीवन में आकांक्षा रखी थी। नहीं मिला तो सिर्फ शकून। आज हर वक्त मैं अपने भीतर एक अधूरेपन का एहसास महसूस करते हुए अकेले में आंसू बहाया करती हूं।
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Re: मनोहर कहानियाँ

Unread post by Jemsbond » 20 Dec 2014 04:24

हुस्न का जाल

‘‘हुजूर मेरा नाम गंगाबाई हैं।’’ बलिष्ठ मगर भोले से दिखने वाले युवक के साथ आई प्रोढ महिला ने ए.एस.आई. रावत के सामने पेश होते ही सिर झुका कर दबे लहजे में बताया था।
‘‘मेरी ससुराल रामगढ में और मायका दीनापुर में है।’’ फिर उसने अपने साथ आए युवक की ओर इशारा किया था, ‘‘यह मेरा भतीजा कालिया है हुजूर।’’
‘‘कहो...’’ उसे घूरते हुए रावत ने पुिलसिया अन्दाज में जानना चाहा था, ‘‘किस लिए आए हो यहां.... ?’’
उस वक्त सुबह के दस ही बजे रहे होंगे और रावत अभी कुछ ही देर पहले आफिस में आया था।
‘‘हुजूर इसके बाप रामा की मौत हो गई है। उसके दाह-संस्कार में हिस्सा लेने ही में सुबह ससुराल से आई हूं।’’ गंगाबाई रो पड़ी। ‘‘ कहने को तो वह मौत ही है हुजूर, मगर मुझे शक है कि मेरा भाई मरा नहीं है, बल्कि किसी ने उसे मार डाला है।’’
‘‘क्या उसकी किसी से दुश्मनी थी।’’
‘‘बाहर तो किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी, मगर उसकी अपनी बीबी से नहीं बनती थी और मुझे शक है कि उसी ने मेरे भाई को मारा है। वह मेरे भाई की दूसरी बीबी है।’’
‘‘क्यों.... ’’ रावत एकाएक उसकी बात का यकीन न कर सका था। ‘‘उस औरत को भला अपना सुहाग उजाड़ने की क्या जरूरत थी।’’
‘‘बताते हुए तो शर्म आती है हूजूर।’’ गंगाबाई का सिर पहले से भी ज्यादा झुक गया था, मगर सच को सामने लाने के लिए बताना ही होगा..... मेरी भाभी बदचलन और आवारा किस्म की औरत है हुजूर।’’
‘‘तुम यह कैसे कह सकती होे कि वह बदचलन और आवारा किस्म की औरत हैं।’’
रावत को उसकी बातों में कुछ-कुछ सच्चाई दिखाई देने लगी थी, ‘‘क्या इस बारे में कभी तेरे भाई ने तुम से कुछ कहा था?’’
‘‘कुछ दिन पहले जब वह मुझसे मिलने मेरी ससुराल आया था, तो उसने बातों ही बातों में कहा था कि मेरी भाभी बसंती अपने पड़ोसी संजय से बहुत ज्यादा हिल-मिल गई हैं।’’ गंगाबाई ने बताया था, ‘‘उसने यह भरी कहा था हुजूर कि उसे उन दोनों का मिलना पसन्द नही हैं।’’
‘‘यह संजय इस वक्त कहां मिल सकता है।’’
‘‘वह शहर में ठेकेदार राम मनोहर के पास मिस्त्राी का काम करता है हुजूर।’’ देर से खामोश खड़े कालिया ने पहली बार मुंह खोला था, ‘‘ पिछली बार जब वह गांव आया था तो उसने बताया था कि दूसरे मजदूरों के साथ वह भी रेलवे स्टेशन के पास वाले मैदान में झोपड़ी बनाकर रहता हैं।’’
‘‘तो क्या वह हर रोज वहां से तेरी मां से मिलने आया करता था।’’
‘‘वह हमारे गांव का ही है हुजूर।’’ उसकी बात तीर की मानिंद कालिया को चुभी तो थी, मगर वह अपनी मजबूरी से भी अन्जान नहीं था। अपमान को पी जाने में ही अपनी भलाई समझकर उसने बताया था, ‘‘अभी महीना भर पहले ही वह शहर गया है।’’
प्रतीक चित्र
‘‘अगर तेरा यह शक सही निकला कि तेरे भाई को मारा गया है।’’ रावत गंगाबाई की ओर देखता हुआ बोला था, ‘‘तो यह पता लगाना भी जरूरी है कि यह काम उसने अकेले ही किया था या उसके साथ कोई दूसरा भी था।’’ फिर उसने गंगाबाई को बोलने का मौका दिए बगैर ही कहा था, ‘‘तुम एक काम करो..... ’’
‘‘क्या हुजूर...... ’’
‘‘मुंशी जी के पास अपनी शिकायत दर्ज करवा दो..... मैं तेरे भाई के पोस्टमार्टम का इन्तजाम करता हूं।’’
उसी शाम करीब छः बजे पोस्टमार्टम के बाद डाक्टर ने रामा की लाश रावत की मौजूदगी में रामा के परिवार वालों को सौपते हुए कहा था, ‘‘रिर्पोट आपको चैथे दिन शाम को ही मिल सकेगी।’’
बसंती भी उस वक्त वहीं मौजूद थी। उसने रावत से बात भी करनी चाही थी, मगर रावत उसे अन्देखा करते आगे बढ़ गया था।
‘‘तेरा शक एकदम सही है।’’ चैथे दिन शाम को जब गंगाबाई कालिया को साथ लेकर रावत से मिलने गई्र थी, तो रावत ने उन्हें पोस्टमार्टम रिर्पोट के बारे में बताया था, ‘‘रामा को किसी कपड़े से गला घोटकर मारा गया था.... ’’
‘‘तो.... तो फिर..... ’’ गंगाबाई सच्चाई जानते ही उत्तेजित हो गई थी, ‘‘उस कुलटा को हिरासत में ले लीजिए हुजूर।’’
‘‘क्या तुम बसंती की बात कर रही हो?’’
‘‘हां.... उसी ने तो मारा है, मेरे भाई को.... ’’
‘‘फिलहाल मेरे पास उसके खिलाफ कोई सबूत नही है और सबूत के बिना किसी को भी दोषी करार नहीं दिया जा सकता।’’ रावत ने समझाया था, मेरे आदमी छानबीन कर रहे है। जैसे ही हमें किसी के भी खिलाफ कोई सबूत मिल गया। उसी वक्त हम उसे हिरासत में ले लेगें।’’
रावत के बाहर आते ही जग्गू उनके पास पहुंच गया। जग्गू को देखते ही रावत ने चहकते हुए पूछा, ‘‘क्या खबर लाए हो?’’
‘‘अपने खसम का दाह-संस्कार करने के बाद वह पेट दर्द का बहाना बनाकर अस्पताल में दाखिल हो गई है।’’
‘‘यह तो कोई खबर नही है?’’
‘‘खबर है..... इसलिए तो बताने आया हूं।’’
बिना कुछ कहे ही रावत सवालिया निगाहों से उसकी ओर देखता रहा।
‘‘उसी रात ग्यारह बजे वह अपने बिस्तर से उठ कर कहीं चली गई थी।’’ जग्गू ने रहस्यमय अन्दाज में बताया था, ‘‘और सुबह पांच बजे तक वापस नही आई थी..... यह बात सिर्फ उसी रात की नही हैं..... वह रात को अपने बिसतर से इसी तरह गायब रहती है।’’
‘‘अब यह खबर बनने लगी है।’’ रावत ने सिगरेट सुलगाने के बाद जिज्ञासा भरी निगाहें उसके चेहरे पर टिकाते हुए पूछा, ‘‘कहां जाती है वह रात को.... ’’ फिर उसने अपने सवाल का जबाब भी खुद ही सवालिया अन्दाज में दे डाला, ‘‘कहीं वह अपने किसी यार के साथ रंगरलियां मनाने तो नही जाती है?’’
‘‘मेरा भी यही ख्याल है कि वह अपने जिश्म की आग बुझाने के लिए ही रात भर अपने बिस्तर से गायब रहती है।’’
‘‘तूने उसका पीछा किया था?’’
‘‘नही..... ’’ जग्गु ने उसका पीछा न करने की वजह बताई थी, ‘‘एक तो गांव का मामला है साहब, दूसरे अपनी पोल खुल जाने के डर से वह अपने यार से मिलकर मेरी भी बोली बंदकर सकती है।’’ जग्गू धीरे से हंसा था, ‘‘और मैं अभी मरना नही चाहता हूं।’’
‘‘ठीक है, तुम जाओ।’’ सिगरेट के लम्बे-लम्बे कश लेते हुआ रावत उठ खड़ा हुआ, ‘‘ अब मैं देखता हूं कि मुझे क्या करना है।’’
उसी रात दस बजे के आस-पास रावत मेकअप में पहले अस्पताल जाकर इस बात का यकीन कर लिया कि बसंती अपने बिस्तर पर ही है। फिर वह अस्पताल के बाहरी गेट के पास ऐसी जगह छुप गया जहां से अस्पताल के अन्दर-बाहर आने-जाने वालों पर नजर रखी जा सकती थी।
प्रतीक चित्र
करीब आधे घंटे बाद ही उसे हल्की सी रोशनी में एक परछाई सी बाहर आती हुई दिखाई दी। रावत सावधान हो गया। जब वह परछाई गेट के पास पहंुची तो रावत को उसे पहचानने में जरा सी भी दिक्कत नही हुई। वह बसंती ही थी, गेट पर रूककर बंसती ने पलटकर पीछे के ओर देखा। जब उसे इस बात का यकीन हो गया कि उसका पीछा नही किया जा रहा है, तो वह तेज कदमों से एक तरफ बढ़ने लगी।
कुछ ही देर चलने के बाद बंसती एक झोपड़ी में दाखिल हो गई। इस बार उसने पलटकर देखने की भी जरूरत नही समझी, मानो उसे यकीन था कि न तो उस पर किसी को शक ही था और न ही कोई उसका पीछा कर रहा था।
रावत झोपड़ी के बाहर ही रूककर अन्दर से आने वाली आवाजों को सुनने की कोशिश करने लगा।
‘‘तुम से कितनी बार कह चुका हूं.... ’’ झोपडी में जलने वाला दीपक बुझा दिया गया था, भीतर से किसी मर्द की दबी हुई आवाज उभरी थी, ‘‘ .... कि यहां मत आया करो, अगर किसी को मामूली सा भी शक हो गया तो हमारा सारा खेल ही बिगड़ जाएगा।’’
‘‘अगर किसी को शक हो भी गया तो कोई हमारा क्या बिगाड़ लेगा।’’ बसंती ने उसे दिलसा दिया था।
‘‘मुझे तो वह पुलिस वाला..... ’’
रावत समझ रहा था कि यह बात उसी के बारे में कही जा रह थी।
‘‘वह भी आशिक मिजाज लगात है। अगर वह मुझे पहले मिल गया होता, तो उस बुड्ढे की बोली मैं उससे ही बंद करवाती..... अब भी कुछ नही बिगड़ा है। कल ही उससे मिलकर उसे ऐसे जाल में फंसा लूंगी कि साला सारी छानबीन करवाना भूलकर कुत्ते की तरह मेरे कदम चूमता फिरेगा।’’
‘‘और अगर वह न माना तो क्या होगा?’’
‘‘तब क्या होगा..... ’’ बसंती उसकी बातों से डरी नही थी, ‘‘यह तो मुझे नही मालुम है। हां यह जरूर बता सकती हूं कि अब क्या होगा..... ’’
‘‘अब..... अब क्या होगा?’’
‘‘वही..... ’’ बसंती चहकी थी, ‘‘जो हर रात को होता है।’’
इससे कुछ देर बाद ही चारपाई की चरमराहठ, बंसती की सिसकारियों के साथ युगलबंदी करने लगी थी। यह सुनकर रावत मुस्करा उठा।
अगले दिन शहर से लेडी पुलिस बुलाकर रावत ने बसंती और कालिया को हिरासत में ले लिया। पूछताछ के दौरान पहले तो दोनों अपने आप को बेगुनाह बताते रहे। लेकिन जब रावत ने पुलिसिया रूख अपनाया तो उन्होंने अपना गुनाह कबूल कर लिया। अगर गंगाबाई को उन पर शक न हो गया होता तो उम्र भर उनके गुनाह पर से पर्दा न उठ सका होता।
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Unread post by Jemsbond » 20 Dec 2014 04:26

हवस का भूत



कमल ने धड़कते दिल और उत्तेजना के अतिरेक से, कांपते हाथों से रमिया का हाथ पकड़ लिया जब उसने कोई विरोध नहीं किया तो वे रोमांचित हो उसे अपनी तरफ खींचने लगे। झिझकते हुए रमिया उनके इतने नजदीक आ गई कि उसकी गर्म सांसे उन्हें महसूस होने लगी। कमल ने उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों में भरते हुए अपनी तरफ किया और उसकी बड़ी-बड़ी आॅखों में झांकने लगे। रमिया ने लजाते हुए पलकें झुका लीं पर छूटने की कोशिश नहीं की। अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन पाकर कमले ने अपने कपकपाते ओठ उसके उभरे कपोल पर रखा दिए, तब भी रमिया ने कोई विरोध नहीं प्रदर्शित किया तो उन्होने उसे एक झटका देकर बिस्तर पर गिरा अपने आगोश में ले लिया। एक हल्की सी सीत्कार रमिया के मंुह से निकल गई।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई तो कमल की नींद खुल गई। देखा तो बिस्तर पर वे और उनकी तनहाई के अलावा उनके साथ कोई नहीं था। वे बुदबुदा उठे..... अभी ही आना था किसी को.... थोड़ी देर और नही रूक सकते थे। वे घड़ी देखकर मुस्करा दिए। सुबह हो चुकी थी। दोबारा दस्तक हुई तो उन्होंने उठकर दरवाजा खोल दिया। सामने सोनू खड़ा था अभिवादन करते हुए उसने पूछा, ‘‘अंकलजी, आंटी कब तक आएंगी? मम्मी पूछ रही है।’’
‘‘दो महीने बाद’’ कमल ने बताया।
‘‘थैक्यू अंकल’’ कहते हुए सोनू चला गया तो कमल भी अंदर आ गए।
जबसे उनकी पत्नी ललिता, लंबे समय से मायके गई थी वे बहुत अकेलापन महसूस कर रहे थे। शादी के दस वर्षो बाद भगवान ने उनकी सुनी थी। उनकी पत्नी गर्भवती हुई थी। वे कोई जोखिम नही उठाना चाहते थे इसलिए दो महीने पहले ही ललिता को मायके छोड़ आए थे। पिछले माह ही एक बालक ने जन्म लिया था। जच्चा-बच्चा के कमजोर होने के कारण उनकी सास ने फरमान जारी कर दिया था कि बच्चे के तीन महीने का होने तक वे ललिता को नहीं भेजेंगी। फलस्वरूप कमल इस वक्त ‘‘फोसर््ड-बॅचलर’’ का जीवन व्यतीत कर रहे थे।
पिछले कुछ दिनों से उनका चंचल मन अपने घर काम करने वाली रमिया पर आया हुआ था। युवा रमिया के आकर्षक नयन-नक्श और गदराए यौवन ने उनके रातों की नींद और दिन का चैन हराम कर दिया था। अब जब उनकी पत्नी भी साथ नहीं थी, रमिया का शरीर पाने के लिए वे अधीर हो उठे थे। कमल जानते थे रमिया बहुत गरीब है। कई घरों में काम कर के बड़ी मुश्किल से अपना घर चलाती है। आदमी मतकमाउ है और पत्नी की कमाई पर ऐश करना चाहता है। पैसा ही रमिया की सबसे बड़ी कमजोरी होगी और उसी के सहारे रमिया को पाया जो सकता है। कमल का सोचना था कि पैसे के लोभ में अच्छे-अच्छों का ईमान-चरित्रा डगमगा जाता है फिर रमिया की क्या औकात कि उन्हें हाथ न रखने दे.... हालांकि ललिता के रहते कभी उन्होंने रमिया की ओर आॅख उठाकर भी नहीे देखा था।
प्रतीक चित्र
मन ही मन कोई शातिर योजना बनाकर वे रमिया के आने की प्रतिक्षा करने लगे। जैसे ही रमिया आई वे अपने बिस्तर पर लेट गए। रमिया अंदर जाकर काम करने लगी। जब कमल को लगा कि अब काम खत्म होने को होगा उन्होंने आवाज दी, ‘‘रमिया....जरा सुनो तो....’’
‘‘जी बाबूजी....’’ रमिया साड़ी के पल्लू से हाथ पोछती आ खड़ी हुई।
‘‘काम हो गया?’’
‘‘जी बाबूजी....’’
‘‘इधर आओ मेरे पास’’ कमल ने कहा।
रमिया उनके सिरहाने आकर खड़ी हो गई, ‘‘क्या बात है बाबूजी?’’
‘‘सिरदर्द हो रहा है थोड़ा दबा सकती हो?’’ कमल ने कापती आवाज में पूछा।
रमिया घबरा गई, ‘‘मैं.....?’’
‘‘हां भाई! अब घर में तो कोई और नहीं है’’ कमल ने विवशता दर्शाते हुए कहा,
झिझकते हुए रमिया उनके माथे को आहिस्ता-आहिस्ता दबाने-सहलाने लगी। रमिया के ठण्डे कोमल हाथों का स्पर्श पाते ही कमल का पूरा शरीर उत्तेजना से ऐसे झनझनाने लगा जैसे विद्युत प्रवाहित बिजली का नंगा तार छू गया हो। टूटते हुए शब्दों में सहानुभूति घोलते हुए वह पूछने लगे, ‘‘रमिया तुम इतनी मेहनत करती हो फिर भी बड़ी मुश्किल से गुजारा होता होगा न?’’
‘‘क्या करें बाबूजी मेरा मरद काम नहीं करता इसलिए तंगी होती है।’’ रमिया बोली।
‘‘तुम्हारा आदमी काम क्यों नहीं करता? क्या बीमार रहता है?’’ कमल ने पूछा।
‘‘वह तो खूब हट्टा कट्टा-मुस्टंडा है पर.....अब क्या बताउं बाबूजी नहीं बता सकती....’’ सकुचातें हुए रमिया चुप हो गई।
‘‘कितनी आमदनी हो जाती है तुम्हारी?’’ कमल ने पूछा।
‘‘एक हजार रुपए..... बस बाबूजी?’’ रमिया कमल के सिर से हाथ हटाते हुए बोली।
कमल ने तत्परता से कहा, ‘‘थोड़ा और दबा दे, अच्छा लग रहा है। औरत के हाथों में तो जादू होता हैं। एक बात बताओ रमिया! इतने कम पैसों में तुम्हारा घर कैसे चलता होगा?’’
रमिया खामोश रही तो कमल फिर बोले, ‘‘अगर इतने समय और काम में तुम्हें पंद्रह सौ रुपए मिलने लगे तो कैसा लगेगा?’’
रमिया मुस्करा उठी, ‘‘लगेगा तो अच्छा पर कौन देगा?’’
‘‘मैं दूगा’’ घड़कते दिल से कमल ने कहा और अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया, ‘‘अगर तुम चाहोगी तो मैं इससे भी ज्यादा दे सकता हॅंू।’’
प्रतीक चित्र
रमिया उनके चेहरे को आश्चर्य से देखने लगी। इस अप्रत्याशित दया की क्या वजह हो सकती है? उसने पूछा, ‘‘आप क्यों देगें बाबूजी?’’
कमल, रमिया को अपनी ओर खींचते हुए बोले, ‘‘रमिया मैं तुम्हारे सारे दुख दूर कर दूंगा, तुम्हारी गरीबी भी....तुम्हें गहने-कपड़ों से लाद दूंगा...बस मुझे तुम्हारा थोड़ा सा प्यार चाहिए....तुम्हारे साथ थोड़ी मौज-मस्ती चाहिए।’’
‘‘बीवीजी को पता लगेगा तो?’’ रमिया ने शंका व्यक्त की।
‘‘कैसे पता लगेगा? ऐसी बात कोई किसी को बताता है क्या?’’ कमल ने आश्वासन दिया। उनकी सांसे और शब्द बेकाबू हो चले थे।
‘‘मैं तैयार हूं पर मेरी एक शर्त है....’’ रमिया ने कहना चाहा, तो कमल ने उसे बोलने नहीं दिया, ‘‘अरे तुम तैयार हो तो.... मुझे तुम्हारी एक क्या सभी शर्ते मंजूर हेैं, बस मुझे खुश कर दिया करो।’’
‘‘पहले मेरी बात तो सुन लो बाबूजी....’’ रमिया थोड़ा रूखे लहजे से बोली।
कमल के सब्र का बांध टूट रहा था, वह उखडते स्वर में बोले, ‘‘चल जल्दी बता अब मुझसे रहा नहीं जाता....’’
‘‘दरअसल मेरे मरद को कोई बीमारी नहीं है...वह भी आपके समान आशिक मिजाज है। उसका दिल भी एक थाली से नही भरता.... वह यहां-वहां ताक-झांक करता रहता है। मुझे तो लगता है, सारी मरदजात एक सी होती है।’’
रमिया की बात से कमल खिसिया गए पर उन पर तो हवस का भूत सवार था। इसलिए वह कड़वी बात हजम करते बोले, ‘‘चल छोड़ कहा की बात ले बैठी, क्यों रंग में भंग कर रही है?’’
अपना हाथ छुड़ाने का प्रयास करते हुए रमिया बोली, ‘‘पहले मेरीे बात तो सुन लो। मेरी एक ही शर्त है.... जिस दिन आप मुझे बुलाएगें, उस दिन बीवीजी को मेरे मरद के पास भेजना पड़ेगा।’’
कमल तैश में आते हुए बोले, ‘‘जानती हो यह क्या कह रही हो तुम?’’
‘‘अदला-बदली की बात कह रही हूॅ। आपको क्या लगता है हम गरीबों की इज्जत इतनी सस्ती हो ती है कि कोई भी खरीद ले। अरे आप तो पांच सौ ज्यादा देने को कह रहें हैं। मैं आपको हजार रुपए महीना दंूगी.... इस हाथ दे उस हाथ ले.... क्यों बाबूजी?’’
कमल डांटते हुए बोले, ‘‘कैसी बातें कर रही है.... तुम छोटे लोगों की यही आदत खराब होती है कि अपनी औकात भूल जाते हो।’’
रमिया पूरी तरह से अलग हो आॅख दिखाते हुए बोली, ‘‘मैं तो आपकी औकात परख रही हूॅ बाबूजी!’’
कमल की इश्क का भूत अब पूरी तरह से उतर चुका था। ठंडा पसीना पोंछते, खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे की तर्ज पर कभी अपने को कभी जाती हुई रमिया को देख रहे थे।